इंसान हूँ मैं

उन खतो को हाथ मे लिए.. तनहा अकेला खडा हूँ मैं
सोंचता हूँ वक्त के हाथो.. कौन सी बाजी हारा हूँ मैं
रहमते खुदा होती अगर.. तो रुख मोड देता हर उस लम्हे का
पर कोई खुदा नहीं हूँ.. एक मामूली इंसान हूँ मैं

तेरी तसवीर को सीने से लगाये.. पल पल रोता हूँ मै
अब तो आँसू भी नही बहते.. इतना जङ हो गया हूँ मैं
कभी कभी डाल पर बैठे पंछियों को देख कर मुस्कुरा लेता हूँ मैं
अपनी ही शाखो के सहारे खडा.. एक बूढा बरगद हूँ मैं

काश होते दो पर मेरे भी.. दूर उड जाता मैं उन यादों से
नई दुिनयाँ मे एक आिशयाँ बनाता.. अपने उन पुराने सपनों से
पर आसमान मे आजाद उडने वाला कोई पागल प्रेमी पंछी नही हूँ मैं
एक मामूली इंसान हूँ मैं

वक्त नही हू.. इंसान हूँ मैं
भुलाकर सबकुछ आगे बढ जाऊँ.. इतना ताकतवर नही हूँ मैं
हार मानकर मौत के इंतजार मे बैठा.. एक बुजिदल कायर इंसान हूँ मैं
एक मामूली इंसान हूँ मैं