त्याग

ये मस्ती क्या कर गये, छोड गये सब आप
दुिनयादारी छोड के, होता नहीं मिलाप

या मदिरा नाइ है, जो पी कर हम बौराय
मुक्ती की ही प्यास है जो छिन छिन बढती जाय

अपने भीतर सब मिलत, क्यो सब जग ढूढत जाय
आॅंखी अपनी मूॅंद कर ढूंढो सब मिल जाय

पग पग पछेले जात हूॅं, पर हर पग राह बढाय
ज्यौ चिकया फस जात है, पछेले भीर चिल जात

लाठी तेरी क्या गयी, जैसे भैंसन की खाल
भय भीतर का मेरे बन गया मेरी ढाल

कंठन की माला मेरी, देती कछु नहीं ग्यान
राम नाम के वस्त्र मेरे करते नहीं महान

अब केवल एकिह आस है
हर आस का नास होइ जाय

ज्यो गन्ना कोल्हू  पिसाई, जम के गुड बन जाय
बिन तप करे न कछु मिलही, जो मिल माटी मिल जाय