याद करता हूॅं मैं

ये वािदयाॅं, ये बादल, ये खुला आसमाॅं,
इन्हे देख कर तुझे याद करता हूॅं मैं …

ये घटायें, ये फिजाए, ये गुमनाम जंगल,
इनकी तनहाइयों से तेरा ज़िक्र करता हूॅं मैं …

उडी शाख की पत्तियों पे तेरा नाम लिखकर,
तेरी नज्म इन्हे रोज सुनाता हूॅं मैं …

ठहरे हुए पानी मे तेरी तसवीर बना कर,
तेरी परछाइयों से गुफ्तगू करता हूॅं मैं…

फिर एक ख्वाब टूटने के डर से,
कंकर उछाल कर तेरी तसवीर मिटाता हूॅं मैं…

ये झरने, ये  तितलियाँ, ये खामोश किलयाॅंं,
इन्हे देख कर तुझे याद करता हूॅं मैं ||