स्मृती

माघ की ये ठंडी पवन
तुम्हारे न होने का एहसास दिलाती है
बाग मे ये अधखिले सुमन
मुझे तुम्हारी याद दिलाती है

पवन मे तो आज भी वो वेग है
पर इनमे तुम्हारे केशों की वो सुगंध नहीं है
सुमन में तो आज भी वो तेज है
पर इनमे तुम्हारे होठों की वो मुस्कान नहीं है

सूरज की ये मीठी धूप
तुम्हारे गर्म गम हाथो का स्पर्श याद दिलाती है
मेरे हृदय मे तुम्हारे पृेम का ये रूप
मिलन की आग को और बढाती है

ओस में ये भीगी पत्तियां
मुझे लगती है तुम्हारी पल्कें
फूल पर ये उडती तितलियाँ
याद दिलाती है हमारे बीते कल के

ओस तो आज भी गिरती है पत्तो से
पर वो गिरती नहीं है तुम्हारे गालो पे
तितलियाँ तो आज भी उडती है फूलो पे
पर वो फूल नहीं है तुम्हारे बालो में

कोयल के ये मीठे गीत
मुझे तुम्हारे मधुर स्वर याद दिलाती है
विरह के बाद मिलन की ये रीत
मेरे हृदय मे मिलन की आग को और जलाती है

ढलते दिन के संग बढती हुई रात
तुमसे बिछड़ने का समय याद दिलाती है
तुम्हारी कही हुई हर बात
आज भी मुझे याद आती है

दिन तो आज भी ढलता है
पर उसके साथ तुम नहीं होते हो
सूरज तो आज भी उगता है
पर उसके साथ तुम नहीं मिलते हो

पूनम के इस उज्जवल चाँद को देख
मुझे तुम्हारा सौंदर्य याद आता है
आसमान में तारों का ये मिलन देख
मुझमे मिलन की आग को और बढाता है

घर को जाती ये सूनी गिलयाँ
तुमसे किये हुये वादे याद दिलाती है
गिलयों मे ये मुरझाई किलयाँ
मै अकेला क्यों हू ये मुझसे कहती है

वो गिलयाँ तो आज भी सूनी है
पर ईनमें तुम्हारे वादों की वो यादे नहीं है
वो किलयाँ तो आग भी मुरझाई है
पर ईनमें मेरे अकेलेपन के लिए वो प्रश्न नहीं है

इन राहों पर मै ये सोंचता था
की अब मै तुम्हारे साथ हूँ
पर नहीं मै कल भी अकेला ही था
और आज भी अकेला ही हूँ