ज़िंदगी की दौड़ 


बढ़े चल, बढ़े चल, सखी मेरे बढे चल
ये ज़िंदगी की दौड़ है , इस दौड़ में बढ़े चल

न जीत का तू मान मार, न हार का तू शोक कर
बढ़े चल, बढ़े चल, बस यूहीं तू बढ़े चल

न हारता कोई, न जीतता कोई,
ये ज़िंदगी की दौड़ है, बस दौड़ता हर कोई

जो जीत की चाह हो, संघर्ष फिर स्वयं से हो
न साध तू लक्ष्य वो, जो तूने तय किया ना हो


जाने अनजाने कब मैं इस दौड़ में दौड़ने लगा पता ही नहीं चला । आज जब थक गया हूँ तो ये सोचता हु मैं क्यूँ दौड़ रहा हु ? किसे पराजित करना चाहता हु पता नहीं ।

ये तो ज़िंदगी की दौड़ है। ये वो दौड़ है जिसमे  कोई जीतता नहीं और कोई हारता भी नहीं । सब दौड़ते है बस।

यहाँ हमेशा कोई ना कोई तुमसे आगे है और तुम हमेशा किसी न किसी से आगे रहोगे । इस दौड़ में लाखों को पीछे छोड़ दोगे तो भी हज़ारों से पीछे ही रह जाओगे ।

यदि पीछे मुड़ के देखोगे तो जीत की ख़ुशी होगी और यदि आगे देखोगे तो हार की हताशा ।
केवल सोच का भेद है, जीत का हर्ष करना है हार का शोक ।

ये एक ऐसी दौड़ है जिसमें सब एक समान शुरूवात नहीं करते, और सबका गंतव्य भी एक सामान  नहीं होता । और इस दौड़ में सब कही ना कही पहुँच ही जाते है ।

जब हर कोई कही न कही पहुँच ही जाता है तो फिर इस दौड़ में सब दुखी क्यूँ होते है ?

ये दुःख का भाव इसलिए होता है क्यूँ की यहाँ दौड़ते हम है, संघर्ष हमारा है, परंतु हमने लक्ष्य किसी और का साधा है ।

क्या ऐसी दौड़ में जीतना सम्भव है ? कदाचित – एक उपाय है ।

ऐसी विकट दौड़ में जीत तभी संभव है जब अकेले दौड़ो । अकेले दौड़ेंगे तो कोई पराजित नहीं कर सकता ।

किंतु अकेले दौड़ना कैसे सम्भव है ?
ये असम्भव भी नहीं है !

लक्ष्य है तो दौड़ है । अपना गंतव्य स्वयं निर्धारित करो । किसी अन्य के लक्ष्य को साध कर दौड़ोगे तो अपनी नहीं, उसकी दौड़ के भागीदार बन जाओगे । और फिर जीत की चाह और हार का भय ।

अपना लक्ष्य स्वयं साधों, अपनी ही दौड़ हो, स्वयं से ही संघर्ष हो, अपना ही आरम्भ स्थल हो और अपना ही विजय पट – और फिर कोई हार का भय ही नहीं होगा ।

देश के वीर

हिम्मत भी है, है हौसला, जो प्राण किया वो पाएंगे |
सागर मथ दिया था तभी, अब धरा चीर कर लायेंगे ||

पर्वत क्या रोकेगा हमें, यदुवंश के हम लाल है |
काल का जो काल है, उस काल के हम बाल है ||

उठ वीर मेरे, अब हल उठा, बाली का वो बल दिखा |
सींच कर अपने लहू से, इस देश को आगे बढ़ा ||

रघुवंश के हम वीर है, सागर भी लाँघ जायेंगे |
पर्वतो को काट कर, नयी राह हम दिखलायेंगे ||

I wish you were here

Everyday,
Everyday I wake up see,
and I see you’re away,
away from me, how could you be,
so far away..

Everyday,
I want to see you smile,
walk with me in the farms,
make me a pie,
make me sleep in your arms,
while you sing me a song…

Everyday,
I wish I could kiss you,
and make you love,
here in my dreams,
I wait for you here,
How I wish,
How I wish you we’re here…

याद करता हूॅं मैं

ये वािदयाॅं, ये बादल, ये खुला आसमाॅं,
इन्हे देख कर तुझे याद करता हूॅं मैं …

ये घटायें, ये फिजाए, ये गुमनाम जंगल,
इनकी तनहाइयों से तेरा ज़िक्र करता हूॅं मैं …

उडी शाख की पत्तियों पे तेरा नाम लिखकर,
तेरी नज्म इन्हे रोज सुनाता हूॅं मैं …

ठहरे हुए पानी मे तेरी तसवीर बना कर,
तेरी परछाइयों से गुफ्तगू करता हूॅं मैं…

फिर एक ख्वाब टूटने के डर से,
कंकर उछाल कर तेरी तसवीर मिटाता हूॅं मैं…

ये झरने, ये  तितलियाँ, ये खामोश किलयाॅंं,
इन्हे देख कर तुझे याद करता हूॅं मैं ||

Longest wait..

I’ve lived a frivolous life,
midst blades and knife,
wandered all around,
In the pursuit for bliss,
come take me in your arms,
i beg for one last kiss,
She awaits me, with her arms wide,
I must consign, and the pain shall subside
my love, my life,
take me and burn me to ashes,
and i shall reincarnate..
to kiss you again…

Its You

I am insomniac, feeling restless,
loosing appetite, have become speechless,
struck by Alzheimer’s, I feel only pain,
burning deep and deeper, I feel choked,
I am schizophrenic, dubbed demented,
my symptoms are suicidal..
I am dead, but still it beats,
Its an incorrigible disease,
and it is You…

त्याग

ये मस्ती क्या कर गये, छोड गये सब आप
दुिनयादारी छोड के, होता नहीं मिलाप

या मदिरा नाइ है, जो पी कर हम बौराय
मुक्ती की ही प्यास है जो छिन छिन बढती जाय

अपने भीतर सब मिलत, क्यो सब जग ढूढत जाय
आॅंखी अपनी मूॅंद कर ढूंढो सब मिल जाय

पग पग पछेले जात हूॅं, पर हर पग राह बढाय
ज्यौ चिकया फस जात है, पछेले भीर चिल जात

लाठी तेरी क्या गयी, जैसे भैंसन की खाल
भय भीतर का मेरे बन गया मेरी ढाल

कंठन की माला मेरी, देती कछु नहीं ग्यान
राम नाम के वस्त्र मेरे करते नहीं महान

अब केवल एकिह आस है
हर आस का नास होइ जाय

ज्यो गन्ना कोल्हू  पिसाई, जम के गुड बन जाय
बिन तप करे न कछु मिलही, जो मिल माटी मिल जाय