Oh Lord … Set me Free..

I stand in the aisles of dream world,
am afraid to walk down the road..
aware of what lies ahead..
and hesitant to relinquish my past..
engulfed by this illusion..
I fear my failure..
the illusion of this materialistic world,
Kingdoms, Treasure, Esteem, Love..
I lure for nothing..
All I desire for is Nirvana…

O almighty, the creator of all,
I consign my soul to you..
Oh supreme, extricate me from these worldly pains,
Oh Lord … Set me Free..

I Wish..

I stand alone, looking at the sky..
questions haunt me, don’t know the reason why??
searching for a space where I could lie..
I wish.. I could cry..

I run, your shadow chases me..
I turn around, but I cant see..
Your breath is gripping me..
I wish.. I could fly..

I look in her eyes, and they tell me..
that its not love they have for me..
her smile kills me, when I ask her the reason for lies,
and now I wish.. I could die..

Hatred is all I want for myself…

Hatred is all I want for myself…
I have been broken once before,
Left alone to cry in my caves,
Dont want to be abandoned once again
Philophobic that I am..Frustrated that I am..
Cursing my fate, Crying once again..
Dont want to be hurt again…
Death is all I desire for myself..
Hatred is all I want for myself..

Happy I am than ever before..
No one is around me to hurt me any more..
But I wonder why you still wander in my dreams..
Somniphobic that I have become..
Dont want to close my eyes once again…
I need a shoulder to cry again..
but afraid I am.. of being betrayed once again..
So love is not what I desire for myself…
Hatred is all I want for myself…

शायारी

वो कहते हैं…
वक्त बहुत कम है मेरे पास.. दो पल साथ बिता लीजिये..
क्यों चाहते हो मुझको इतना.. बस इतना बता दीजिये..

मैने कहा..
तारीफ तेरी जो करना चाहूँ.. तो सारी उमर भी कम है..
जरा फुरसत से आखों मे तो बसा लेने दो.. वक्त मेरे पास भी थोडा कम है..

इंसान हूँ मैं

उन खतो को हाथ मे लिए.. तनहा अकेला खडा हूँ मैं
सोंचता हूँ वक्त के हाथो.. कौन सी बाजी हारा हूँ मैं
रहमते खुदा होती अगर.. तो रुख मोड देता हर उस लम्हे का
पर कोई खुदा नहीं हूँ.. एक मामूली इंसान हूँ मैं

तेरी तसवीर को सीने से लगाये.. पल पल रोता हूँ मै
अब तो आँसू भी नही बहते.. इतना जङ हो गया हूँ मैं
कभी कभी डाल पर बैठे पंछियों को देख कर मुस्कुरा लेता हूँ मैं
अपनी ही शाखो के सहारे खडा.. एक बूढा बरगद हूँ मैं

काश होते दो पर मेरे भी.. दूर उड जाता मैं उन यादों से
नई दुिनयाँ मे एक आिशयाँ बनाता.. अपने उन पुराने सपनों से
पर आसमान मे आजाद उडने वाला कोई पागल प्रेमी पंछी नही हूँ मैं
एक मामूली इंसान हूँ मैं

वक्त नही हू.. इंसान हूँ मैं
भुलाकर सबकुछ आगे बढ जाऊँ.. इतना ताकतवर नही हूँ मैं
हार मानकर मौत के इंतजार मे बैठा.. एक बुजिदल कायर इंसान हूँ मैं
एक मामूली इंसान हूँ मैं

स्मृती

माघ की ये ठंडी पवन
तुम्हारे न होने का एहसास दिलाती है
बाग मे ये अधखिले सुमन
मुझे तुम्हारी याद दिलाती है

पवन मे तो आज भी वो वेग है
पर इनमे तुम्हारे केशों की वो सुगंध नहीं है
सुमन में तो आज भी वो तेज है
पर इनमे तुम्हारे होठों की वो मुस्कान नहीं है

सूरज की ये मीठी धूप
तुम्हारे गर्म गम हाथो का स्पर्श याद दिलाती है
मेरे हृदय मे तुम्हारे पृेम का ये रूप
मिलन की आग को और बढाती है

ओस में ये भीगी पत्तियां
मुझे लगती है तुम्हारी पल्कें
फूल पर ये उडती तितलियाँ
याद दिलाती है हमारे बीते कल के

ओस तो आज भी गिरती है पत्तो से
पर वो गिरती नहीं है तुम्हारे गालो पे
तितलियाँ तो आज भी उडती है फूलो पे
पर वो फूल नहीं है तुम्हारे बालो में

कोयल के ये मीठे गीत
मुझे तुम्हारे मधुर स्वर याद दिलाती है
विरह के बाद मिलन की ये रीत
मेरे हृदय मे मिलन की आग को और जलाती है

ढलते दिन के संग बढती हुई रात
तुमसे बिछड़ने का समय याद दिलाती है
तुम्हारी कही हुई हर बात
आज भी मुझे याद आती है

दिन तो आज भी ढलता है
पर उसके साथ तुम नहीं होते हो
सूरज तो आज भी उगता है
पर उसके साथ तुम नहीं मिलते हो

पूनम के इस उज्जवल चाँद को देख
मुझे तुम्हारा सौंदर्य याद आता है
आसमान में तारों का ये मिलन देख
मुझमे मिलन की आग को और बढाता है

घर को जाती ये सूनी गिलयाँ
तुमसे किये हुये वादे याद दिलाती है
गिलयों मे ये मुरझाई किलयाँ
मै अकेला क्यों हू ये मुझसे कहती है

वो गिलयाँ तो आज भी सूनी है
पर ईनमें तुम्हारे वादों की वो यादे नहीं है
वो किलयाँ तो आग भी मुरझाई है
पर ईनमें मेरे अकेलेपन के लिए वो प्रश्न नहीं है

इन राहों पर मै ये सोंचता था
की अब मै तुम्हारे साथ हूँ
पर नहीं मै कल भी अकेला ही था
और आज भी अकेला ही हूँ