राजनैतिक लड़ाई (The Game of Thrones) – Season of 1999

राजनैतिक लड़ाई - A poem dedicated to Atal Bihari Vajpayee
राजनैतिक लड़ाई – A poem dedicated to Atal Bihari Vajpayee

It was the summer of ’99 – when I witnessed “The Game of Thrones” in the Indian Parliament.

My favourite character: Ned Stark (Atal Ji) – First of his name, the only ‘Rightful’ and ‘Truthful’ heir to the throne, was betrayed and dethroned.
He lost the game by just 1 vote!

We (me and my friend Shwetank) were in Class 11. We used to do occasional poetry and were planning to write something for the school magazine.

The story of the ’13-day Govt’ and ’13 months Govt’ was the topic of discussion and we just thought of writing a poem about it.

When we started, we were not sure if it would be worth publishing. To our surprise, it was well appreciated and was also published in the annual school magazine.

Today, I want to bring back that poem which was buried in an old school magazine to make you nostalgic of the real “Game of Thrones” of the ’90s

I want to dedicate this poem to great Atal Ji (The King of the North), who is no more with us… but his visions and dream of making India great remain within all of us.


दूर गाँव से ये आवाज़ है आयी
अपनी भी सुन लो बाजपाई

तुमने तो गठजोड़ से सरकार है बनाई
अब तो सिर्फ उनकी ही होती है सुनवाई

पर अपनी सुनेगा कौन
सारे के सारे बैठे है मौन

पर अपना तो है आपके साथ मत
इसलिए पीछे से भेजा है ये खत

सोचता था की आएगा जवाब
पर मेरे तो टूट गए सारे ख्वाब

जवाब तो आया , पर था बड़ा सख्त
लिखा था यदि तू भी है देश भक्त

तो बंद कर दे ये अपनी कविता
भड़की हुई है आज ललिता

छीनने वाला है अटल का राज
साथ ही गिरने वाला है स्वराज

प्रधानमन्त्री का पद होगा खाली
फिर चमके की सोनिआ के मुख पर लाली

और निकल पड़ेंगे बिहार से लालू
पहुंचते ही कहेंगे सस्ते करवाऊंगा मैं आलू

फिर भड़क उठेंगे यशवंत
और पढ़ देंगे अपना वित्त मन्त्र

भड़क के कहेंगे – क्यों भाई लालू
ये नहीं है तेरा बिहारी आलू

नहीं होगा ये ऐसे सस्ता
दाम बढ़ेंगे अभी रफ्ता रफ्ता

सांगमां कहेंगे – धोडो खस्ता पकड़ो रास्ता
और कांग्रेसी गाएँगे – रामय्या वास्ता

पर नहीं रुकेगी बंगाली ममता
और लगाएगी अपनी पूरी क्षमता

पीछे पीछे आएंगे करुणा निधि
और बीच में लगाएंगे अपनी विधि

पर उनकी विधि रास न आएगी
और पीछे से सोनिआ चिल्लायेगी

आएंगे फिर चंद्रबाबू और कहेंगे क्यों भाई लालू
तू तो निकला बड़ा ही चालू

खा गया सारा का सारा चारा
फिर किया पूरा माल वारा न्यारा

और फिर आएंगे अपने राम कृष्ण
जिनके पीछे होंगे लाल कृष्ण

फिर तो ये शाम ढलेगी रफ्ता रफ्ता
और इनका झगड़ा जाएगा बढ़ता

अंत में प्रकट होंगे नारायण
और कहेंगे नारायण नारायण

नहीं होगी कोई सरकार
तुम सब के सब हो बेकार

और अंत में लिखा प्रिय मित्र
बिगड़ रहा है राजनीति का चित्र

इसलिए अपनी समस्या आप ही रखो
हमको इससे दूर ही रखो

और अंततः मैंने सोचा
सोच कर अपने बालो को नोचा

की आखिर है तो ये भी नेता
जिनको हु मै मत देता

हमारी समस्या तो इन्होने ना सुलझा दी
पर अपनी समस्या हमे पकड़ा दी

निकालने के लिए इसका समाधान
अब फिर से होगा मतदान

और फिर बनेगी कोई नयी सरकार
जो की होगी बिलकुल बेकार

क्यों की आखिर है तो ये भी नेता
जिनको आया हु मैं अब तक वोट देता

दूर गांव से ये आवाज है आयी
अपनी भी सुन लो बाजपायी